एक उस्ताद था वो अक्सर अपने शार्गिदों से कहा करता था कि दीने इस्लाम बड़ा क़ीमती है। ����एक रोज़ एक तालिब-ए-इल्म का जूता फट गया। वो मोची के पास गया और कहा: मेरा जूता मरम्मत कर दो। उसके बदले में , मैं तुम्हें दीने इस्लाम का एक मस्अला बताऊंगा। ����मोची ने कहा: अपना मस्अला रख अपने पास। मुझे पैसे दे। तालिब-ए-इल्म ने कहा: मेरे पास पैसे तो नहीं हैं। मोची किसी सूरत ना माना। और बगैर पैसे के जूता मरम्मत ना किया। ����तालिब-ए-इल्म अपने उस्ताद के पास गया और सारा वाक़िया सुना कर कहा: लोगों के नज़दीक दीन की क़ीमत कुछ भी नहीं। ▶उस्ताद भी अक़लमंद थे: तालिब-ए-इल्म से कहा: अच्छा तुम ऐसा करो: मैं तुम्हें एक मोती देता हूँ तुम सब्ज़ी मंडी जा कर इसकी क़ीमत मालूम करो। ����वो तालिब-ए-इल्म मोती लेकर सब्ज़ी मंडी पहुंचा और एक सब्ज़ी फ़रोश से कहा: इस मोती की क़ीमत लगाओ। उसने कहा कि तुम इसके बदले यहाँ से दो तीन नींबू उठा लो। इस मोती से मेरे बच्चे खेलेंगे। ����वो बच्चा उस्ताद के पास आया और कहा: इस मोती की क़ीमत दो या तीन नींबू है। ▶उस्ताद ने कहा: अच्छा अब तुम इसकी क़ीमत सुनार से मालूम...